कभी खुद से मिलने का मन करे तो यहां जरूर आइएगा
अल्मोड़ा की खूबसूरत वादियों में खुला शानदार होमस्टे, आप भी परिवार के साथ जरूर आएं

मैंने अपने दादाजी को कभी नहीं देखा। दादा जी कैसे दिखते थे, ताऊजी, पापाजी और चाचाजी ही इस बात को जानते थे। कालचक्र ने चारों पिता-पुत्रों को आसमान में चमकने वाले तारों के परिवार का हिस्सा बना दिया है, जो कुछ बोलते या बताते नहीं बस टिमटिमाते और प्रकाश लुटाते हैं। शाम को जो पहला तारा निकलता है न, जिसे देखते ही हम बचपन में जोर-जोर से चिल्लाने लगते थे- पहला तारा मैंने देखा, पहली विद्या मेरी। जब तक पहाड़ के घरों में घड़ी नहीं थी, तब शाम ढलने से सुबह होने तक वो तारा घड़ी का काम किया करता था। अक्सर चार बजे के आसपास नींद खुलने पर बुआ उस तारे को देखकर बता दिया करती थी कि कुछ ही देर में सुबह होने वाली है। आसमान में उस तारे के ठीक पड़ोस में अब एक और छोटा तारा नजर आता है। वो एकदम बुआ सा है। अपनी रवानगी में रहता है। बरसों बाद लंबे समय तक पहाड़ पर रुकना हुआ। उस तारे को बुआ मानकर उससे घंटों बातें की। खासतौर पर उस वक्त की जो बुआ के साथ पहाड़ पर गुजरे। मुझे पीठ पर लेकर बुआ का मीलों पैदल चलना, स्कूल के आधे रास्ते तक छोड़ देना और फिर लेने आना, कहीं कुछ भी अच्छी खाने वाली चीज मिलने पर उसे साड़ी के पल्लू में बांधकर हमारे लिए ले आना, मम्मी और राजू के ननिहाल जाने पर परीलोक की कथाएं सुनाकर मुझे सुलाना।
मैं पहाड़ का मूल निवासी हूं। मगर इससे पहले मैंने पहाड़ और प्रकृति को कभी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं किया। पहाड़ खुद भले ही स्थिर खड़े हों मगर खुद पर मौजूद चीजों का जड़ हो जाना उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। नदियों को जन्म देने के बाद हजारों मील दूर सागर से मिलने भेज देते हैं। रास्ता तक नहीं बनाते, न ही रास्ते की दिक्कतों के बारे में आगाह करते हैं। पेड़ों को दिन भर हिलना पड़ता है, हवा के ताजा झोंकों लिए। अनाज और फल सैकड़ों मील का सफर तय करके हम तक आ पहुंचते हैं। कुछ तो सात समंदर पार का सफर भी तय कर लेते हैं। चिड़िया पौ फटने के साथ ही निकल पड़ती हैं, भोजन की तलाश में। चीटियों की पूरी कालोनियां रोज लंबा सफर तय करती हैं। जिन पत्थरों से पहाड़ का वजूद है, कभी-कभी पहाड़ उनको भी खुद से छिटक देता है। वो नाराज पत्थर बन जाते हैं पर्यटकों के नए सेल्फी प्वाइंट या फिर किसी सड़क, मकान, दुकान के जमींदाज होने की वजह। पहाड़ जिन पत्थरों को अपनी पीठ से छिटकता है, वो नदी की गोद में जा बैठते हैं। नदी उनसे टकराकर अक्सर शोर मचाती है।ध्यान से सुनिए तो ऐसा लगता है जैसे दो भाई-बहन आपस में लड़ रहे हों। नदी अपने रास्ते से हटने को कहती है मगर उसे यह मालूम नहीं होता कि पहाड़ ने केवल उसे ही चलना सिखाया है, पत्थर को नहीं। पहाड़ का दूसरा नाम निरंतरता है। वहां रुकने, थकने, हारने, बैठने, ठहर जाने की इजाजत किसी को भी नहीं। इंसान को तो बिल्कुल भी नहीं। खैर—।
पहाड़ पर अपने पु्श्तैनी मकान का जीर्णोद्धार करने के लिए अरसे बाद घने जंगलों के बीच बसे अपने गांव में लंबे समय तक रुकना हुआ। चंदन दा, महेश दा, गणेश दा, राजू दा, मनोहर दा, भूपाल दा, दीपक राना, पप्पू काका, चाची और छोटी सी प्राची। सबमें पहाड़ की निरंतरता थी। सुबह से शाम तक अपने काम में डटे रहना और दिन ढलने पर अपने घर को विदा हो जाना। इन सबको देखकर मेरी जड़ता भी जाती रही। पत्थर उठाने से लेकर फावड़ा, बेलचा, कुदाल और संबल चलाना सब सीख गया मैं। इन सबके साथ काम में डटने पर न तपते सूरज की चिंता रहती न पानी की तेज फुहारों की। दिन भर काम में डटने के बाद शाम को आसमान में तारे के रूप में टिमटिमाती बुआ से सैकड़ों बातें की। बुआ का जबाव कभी हवा के ठंडे झोंके लेकर आया तो कभी पानी कही ठंडी फुहारों के रूप में।
जंगल, नदी, पगड़डी और सीढ़ीदार खेतों के बीच बना मेरा पु्श्तैनी मकान करीब चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद नए रंग-रूप में आ गया है। इस पूरी कवायद के बीच मेरा प्रयास रहा कि इसका मूलरूप रत्ती भर भी नष्ट न हो। काम खत्म करने के बाद पहाड़ से विदा ली तो ऐसा लगा जैसे दादी मां घर की सीढ़ियों पर बैठी मुस्कुरा रही हों, धोती के पल्लू से अपना चश्मा साफ करते हुए। गजब की मुस्कान थी उनके चेहरे पर। दादी बरसों पहले दादाजी के साथ तारालोक के परिवार की सदस्य बन चुकी हैं। दादी का सीढ़ियों पर बैठे होना और मुस्कुराना शायद मेरी कल्पनाभर थी। मगर उस मुस्कुराट को याद करके जेहन में एक नाम आया। पितृछाया- बालादत्त-हरुलीदेवी सदन। पूज्य दादाजी एवं दादीजी को समर्पित।
कभी खुद को खोजने, खुद से मिलने, खुद के भीतर झांकने और चांद-तारों से बात करने का मन हो तो आप भी यहां जरूर आइएगा। मोबाइल, गैजेट की दुनिया को खुद से दूर करके। यकीन मानिए, प्रकृति ऐसे परलौकिक अनुभव कराती है, जो आपके शरीर और मन को भीतर तक धो देते हैं। आप बहुत कुछ नया और अलग अनुभव करते हैं। कुछ ऐसा, जो आपने पहले कभी नहीं किया होता।



