
भाग-01
चंदन दा (चंदा) और महेश दा। दोनों गजब के शिल्पकार हैं। पहाड़ का सीना चीरकर निकलने वाले पत्थरों से इंसानों के आशियाने बनाते हैं। चंदा का हथौड़ा किसी साधारण पत्थर को मकान की नींव से छत तक कहीं भी अपनी जगह बनाने का हुनर सिखा देता है। तपती दोपहरी में चंदा अपने हथौड़े से टेढ़े-मेढ़े पत्थरों को मकान में लगने लायक बना रहे थे। महेश दा दीवार बनाने में व्यस्त थे। राजू दा, मनोहर दा और चाची जी चंदा के तराशे हुए पत्थरों को उन तक पहुंचा रहे थे। हर 10 से 15 मिनट के बाद चंदा नजर ऊपर उठाते और महेश दा से कहते, वो देखो वो तीसरा पत्थर ठीक से नहीं लगा, उसे थोड़ा अंदर की ओर ठोको। जब भी उनकी नजर ऊपर उठती वह कुछ न कुछ ठीक जरूर कराते। निर्माणकला की यह बारीकी चंदा की जीवनभर की तपस्या का परिणाम है, जो उन्होंने घर बनाते-बनाते हथौड़े की चोटों, गारे और मिट्टी के बीच रच-बसकर सीखी है।

दिन आगे बढ़ा, शाम ढलने लगी। काम खत्म करके चंदा चाचाजी के साथ चाय की चुस्कियों की बीच बातचीत में व्यस्त हो गए। हम लोग इधर-उधर बिखरा पड़ा सामान समेटने लगे। कुछ देर बाद चंदा ने आवाज लगाई- त्याड़ ज्यू, इथां आओ (तिवारी जी, इधर आओ।)
अगले ही पल मैं चंदा के सामने था। चंदा हाथ में पर्स लिए बैठे थे। उसमें उनकी जवानी की फोटो थी। पै बताओ धैं, ज्वान छिना कौस लाग छी मी? (बताइए तो मैं जवानी में कैसा लगता था)
आहा चंदा एकदम हीरो भै या यार तुम, जोरदार लागण रै छा हो (चंदा आप एकदम हीरो जैसे जोरदार लग रहे हो), मैंने जवाब दिया। साथ में एक महिला की फोटो भी थी। मैं कुछ पूछता, उससे पहले चंदा बोल उठे- यो मेरि चंपा भई, भौते भलि भई, गोरि फनार, देखण-चाण, म्यर भौते ध्यान धरनेर भई हो यौ। (यह मेरी चंपा है, बहुत अच्छी, देखने भालने में बहुत सुंदर, मेरा बहुत ध्यान रखने वाली ठहरी यह), चंदा कुछ और बताना चाहते थे, मगर किसी ने मुझे आवाज दी और मैं सामान समेटने उसके साथ चल दिया। कुछ ही देर में दिन ढल गया। चंदा और बाकी साथियों को विदा करके हम भी घर लौट आए।
भाग-02
रात को खाने के वक्त मां और चाची ने बताया कि चंदा घर के रास्ते होकर गए थे। दरअसल, अपने पुश्तैनी मकान के नवीनीकरण के दौरान हम लोग अपने ताऊजी स्वर्गीय भुवन चंद्र तिवारी जी के मकान में रुके हुए थे। गांव आने-जाने का रास्ता उनके आंगन से होकर गुजरता है। चंदा भी वहीं से आते-जाते थे। आज चंदा बहुत दुखी थे, पर्स से चंपा की फोटो निकालकर दिखा रहे थे। चंपा बहुत अच्छी थी, हमारे गांव भी आती-जाती थी, मेरी कई मुलाकातें थी उससे, जितनी अच्छी उसकी सूरत थी, उससे अच्छा उसका मन और व्यवहार था- मां ने बताया।
चंपा थी मलतब, क्या अब नहीं हैं? मैंने चौंककर मां से पूछा। नहीं, चंपा अब नहीं रहीं- मां ने बताया। जंगल से घर लौटते वक्त पहाड़ से फिसलकर सड़क पर गिर पड़ी। कुछ देर बाद दम तोड़ दिया उसने। चंदा को इसी बात का गम है कि अंतिम समय में दो बातें भी ठीक से नहीं हो पाई उससे। कुछ देर बाद सब लोग खाना खाकर सो गए। मैं रोज बिस्तर पर गिरते ही गहरी नींद में चला जाता था, मगर आज नींद गायब थी। पहले बुआ और फिर पापा, बिना एक शब्द बोले अंतहीन यात्रा पर निकल गए थे। एकदम चंदा की चंपा की तरह। चंदा पहले दिन से अपने से लगते थे, गजब के शिल्पकार होने के बाद भी उनकी सादगी, सरलता और हर बात पर- त्याड़ ज्यू, है जाल पै है जाल, भली भां करुंल, तुम चिंता नी करौ, एकदम फस्क्लास काम करुंल तुमर (तिवारी जी, सब हो जाएगा, ठीक से हो जाएगा, आप चिंता न करो, आपका काम एकदम शानदार होगा।), आप लाख चाह लें तो भी चंदा से नाराज नहीं हो सकते। आज चंदा बहुत अपने लगने लगे थे। जिस दर्द को वह सीने में छिपाकर जी रहे थे, मैं भी उसी दर्द से वाबस्ता था। साथ छोड़कर जाते वक्त गोद में खिलाने वाली, पीठ पर लेकर पहाड़ नाप देने वाली बुआ कुछ नहीं बोलीं, न ही जन्म देने वाले पिता ने एक शब्द कहा। चंदा को चंपा का निशब्द होकर साथ छोड़ जाना कितना खलता होगा? खुद के सवालों का खुद को जवाब देते-देते रात न जाने कहां गुम हो गई।

भाग-03
सुबह हुई। नौ बजे चंदा महेश दा के साथ काम पर आ गए। राम-राम, दुआ-सलाम के बाद चंदा पत्थरों को तराशने में जुट गए। दिन ढला, शाम हुई। चंदा जैसे ही काम खत्म करने के बाद चाय का गिलास हाथ में लेकर बैठे, मैंने उनसे पर्स में रखी चंपा जी की फोटो दिखाने का अनुरोध किया। चंदा ने पर्स निकाला और फोटो सामने रख दी। एक तरफ चंदा और दूसरी तरफ चंपा जी। फिर बोले- जागो हां (जरा रुकिए) और फिर अपनी और चंपा जी की फोटो दीवार के एक पत्थर पर रख दी। अगल-बगल। क्या हुआ था चंदा? मेरे सवाल पर चंदा अतीत में चले गए। के बतुं यार तुमुकूं, सब बखताक खेल भाय, नै गेई मेरी चंपा (आपको क्या बताऊं, सब वक्त का खेल है, मेरी चंपा चली गई।) चंदा ने कहा।
एक गहरी सांस लेने के बाद चंदा बोले, उस दिन मेरे घर में मेरे समधी-समधन आने वाले थे। मैं चिनौना गांव में गोपाल दा का मकान बना रहा था। मैंने उनसे सुबह ही कहा कि आज मेरे घर में मेरे बेटे के ससुराली आ रहे हैं। जैसे ही उनका फोन आएगा मैं घर चला जाऊंगा। उनके स्वागत सत्कार के लिए कुछ सामान लेना था। इसलिए मैं दोपहर तक काम करके गोलूछीना (हमारे गांव का लोकल बाजार) चला गया। वहां किसी राहगीर ने बताया कि चिनौना की घुस्तोधार के पास एक महिला ऊपर से सड़क पर गिर गई थी, उसके सिर में चोट लगी है, कुछ लोगों ने उसे सड़क किनारे एक तख्ते पर लिटा दिया है। किसी के चोटिल होने की खबर सुनते ही मैं समधी-समधन के आने की बात भूल गया और लोगों के साथ मौके पर दौड़ा।
अब के बतूं यार त्याड़ ज्यू, वां पुजौ जब उ सैणि मेरी चंपा भई। मी चाइयै रै गोय। कल्ज मुखम हूं जौ ऐ गोय हो। (क्या बताऊं यार तिवारी जी, वहां पहुंचकर मैंने देखा कि वह महिला कोई और नहीं मेरी चंपा थी। मैं देखता रहा गया। मेरा कलेजा मुंह को आ गया।) मैंने आनन-फानन में गाड़ी बुलाई। चंपा का सिर अपनी गोद में रखा, काफी खून बह चुका था। वह एकटक मुझे देखे जा रही थी। मैंने पूछा-क्या हो गया तुमको, कैसे गिर गई तुम?
मी नै जंगोउम गोर हकै बेर ठांगौर ली बेर ऊण रौय, सामणी बै एक गोर आय, मील वी लीजि बाट छोड़ण चाय, ठांगौर बिलख लागौ जब मी रड़ी बेर भड़म सड़क मी घुरि गोय (मैं जंगल में गाय हांककर आ रही थी। आते वक्त एक ठंगरा लेकर आ रही थी। सामने से आ रही गाय के लिए मैंने रास्ता छोड़ा तो ठंगरा कहीं फंसने से मेरा पैर फिसल गया और मैं जोर से रोड पर गिर पड़ी), पहाड़ में चीड़ के पेड़ काटकर ठंगरा बनाया जाता है, जिस पर लौकी, तोरई खीरे, कद्दू की बेल जाती है।
इतना कहकर चंपा ने आंखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद हम अस्पताल पहुंचे। डॉक्टर ने चंपा को देखा और कहा- सॉरी। कुछ पल को मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। बरसों का साथ बस एक पल में छूट गया। चंपा अब खामोश थी। मेरे मन में सैकड़ों सवाल, जो मैं उससे पूछना चाहता था, पर पूछता किससे, इसलिए आंसुओं के साथ सवाल भी पी गया।
चंपा मेरी पूरी दुनिया थी। माता-पिता के लिए सुशील बहु, हर बात की चिंता करने वाली, चेहरा देखकर मेरा सुख-दुख समझ जाने वाली पत्नी, बच्चों के लिए आदर्श मां, गांव वालों के सुख-दुख काम काम आने वाली हंसमुख महिला। अस्पताल जाते वक्त जो चंपा एकटक मेरी ओर देख रही थी, लौटते वक्त मेरी गोद में उसकी स्पंदनहीन देह थी, मैं इस उम्मीद में था कि चंपा अभी उठेगी और बोलेगी- किले के है रो हो तुमुकूं, डाढ़ किलै मारण रौ छा (अरे क्या हो गया तुमको, क्यों रो रहे हो), मगर चंपा कुछ नहीं बोली। उसे अंतिम विदा देते वक्त मैंने ईश्वर से पूछा- हे भगवानौ यौ के कर तुमूंल, तौस के पाप करी भौय मील, मेरि चंदा कूं किलै ली गया तुम (हे भगवान, यह तूने क्या किया, मैंने ऐसे कौन से पाप किए थे, जो मेरी चंपा को मुझसे छीन लिया।)
दिन गुजरे। पूरे घर की रौनक अब दीवार पर फ्रेम में मढ़ी हुई एक तस्वीर में सिमट गई। एक मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ। जब भी देखता हूं लगता है कि अभी बोल पड़ेगी। कुछ दिन बाद मैंने अपने पर्स में दो तस्वीरे लगाईं। एक चंपा की और दूसरी खुद की। तब से चंपा हर वक्त मेरे साथ रहती है। जब दिल घबराने लगता है, टूटन सी होती है तो एक बार उसकी तस्वीर निकालकर देख लेता हूं। मन हल्का हो जाता है।
मैंने शिल्पकारी बहुत दिल से सीखी। काम भी हमेशा मन लगाकर किया। चंपा जब तक मेरे साथ थी तब भी और उसके जाने के बाद भी। मैं किसी का घर बनाते वक्त यह सोचता हूं कि बेहतर से बेहतर बनाऊं। जब उस घर में कोई परिवार खिलखिलाएगा तो मेरी मेहनत देखकर मेरी चंपा भी बहुत खुश होगी। चंपा के लिए मेरा प्रेम मुझे मेरे काम में कभी बेइमानी नहीं करने देता। कभी-कभी बहुत अकेला महसूस करता हूं तो चंदा से मन ही मन पूछता हूं-
-घर पर मेहमान आने वाले थे तो तुम गाय हांकने जंगल क्यों गईं
-ठंगरा क्यों लेकर आईं, किसी दूसरे दिन आ जाता
-सड़क पर गिरने के बाद तुमने किसी को आवाज क्यों नहीं लगाई
-तुमने एक बार भी यह क्यों नहीं सोचा कि तुम्हारे बाद मेरी चिंता कौन करेगा
-ठीक है पहले ही जाना था तो इतनी जल्दी क्यों चली गईं
-तुम मुझसे इतना नाराज क्यों थी कि जाते वक्त ठीक से बात भी नहीं की
-जाते-जाते तुम घर को और मुझे किसके भरोसे छोड़ गईं
-जिसने तुमको सड़क पर गिरा देखा वह तुमको अस्पताल क्यों लेकर नहीं गया
-उसने तुमको पहचानकर मुझे फोन क्यों नहीं किया
-अगर वह मुझे समय पर फोन कर देता तो तुम आज शायद मेरे पास होतीं
-अगर हम समय से अस्पताल पहुंच जाते तो शायद तुम बच जातीं
-मैं उस दिन काम पर गया ही क्यों, न जाता तो शायद तुम जंगल न जातीं
पै के करीं हो, सब किस्मताक खेल भाय, वीकल अघिल बै कैक एक नी चलिन (क्या करें, सब किस्मत का खेल है, वक्त के आगे किसी की एक नहीं चलती।), चंपा जी की याद में डूबे चंदा के दिल में उमड़ा यादों का सैलाब पलकों के तटबंध तोड़कर बह जाना चाहता था। मगर चंदा अपने आसूं पी गए। लाठी उठाई, झोला कंधे पर टांगा और बोले- अच्छा पै त्याड़ ज्यू, अब हिटनू, भोव होलि मुलाकात, के करी पैं, इस्सै भई किस्मत, इदुकै दगड़ हुनल चंपा दगै म्यर (अच्छा तिवारी जी, चलता हूं, कल मिलेंगे, क्या कर सकते हैं, इतना ही साथ होगा चंपा का और मेरा।)
प्रेम करना एक बात है, उसे निभाना दूसरी और प्रेम के साथ जीना तीसरी। मगर चंदा अमर प्रेम की पावनी त्रिवेणी सरीखे हैं। चंपा जी से प्रेम किया, उसे शिद्दत से निभाया और अब उसी प्रेम के साथ जी रहे हैं। सिर से पांव तक चंपा जी के प्रेम रंग में रंगे चंदा बरसों से लोगों के जीवन में खुशियां भर रहे हैं। उनका हाथ लगते ही बेजान पत्थर शानदार मकानों में तब्दील हो जाते हैं। लकड़ियां खिड़की-दरवाजे बनकर मकान और इंसानों की सुरक्षा कवच। मकानों की खिड़कियों की तरह एक खिड़की चंदा के मन में भी है, जहां रोज हवा के झोंकों के साथ चंपा जी की यादें आती-जाती हैं। वही यादें चंदा के जीने की वजह भी हैं।
भाग-04
चंदा के दो पोते हैं। दोनों पर वह जान छिड़कते हैं। चाय के साथ कोई भी नाश्ता बनता, जो चंदा को पसंद आता तो वह उसे बचाकर चुपचाप अपने टिफिन में रख लेते। चंदा आप खा लिया करो, मैं टिफिन में अलग से रख दूंगा- एक दिन मैंने कहा।
होई पै त्याड़ ज्यू यौ तो भौत भल है जाल (अरे हां तिवारी जी, यह बात बहुत अच्छा हो जाएगा)- चंदा बोले।
घर पर दो पोते हैं। मैं जब भी घर जाता हूं तो पूछते हैं- दादू चीज लाए क्या। इसलिए कहीं कुछ अच्छा मिलता है तो उनके लिए जरूर ले जाता हूं। अगर चंपा होती तो वह भी उनका वैसे ही ख्याल रखती, जैसे मैं रखता हूं। मैं क्या कर पाता हूं, वह तो मुझसे भी बहुत ज्यादा ख्याल रखती। यह चंपा जी के प्रेम की ताकत ही है कि चंदा अपने पोतों के लिए दादा के साथ दादी का किरदार भी निभा रहे हैं। पोतों का जिक्र होते ही उनकी आंखों में उनके लिए जो वात्सल्य उमड़ता है, उसको शब्दों में ढालना मेरे जैसे साधारण इंसान के लिए संभव नहीं है।
भाग-05
पु्श्तैनी मकान के जीर्णोद्धार के बाद 24 जून को पूजन था। चंदा और महेश दा को मकान बनने के दौरान ही कई बार न्यौता दिया। मगर, दोनों में से कोई नहीं आया। राजू दा, मनोहर दा और गणेश दा ने बताया कि चंदा का स्वास्थ्य खराब है। वह अस्पताल में भर्ती हैं। दो दिन पहले चंदा अस्पताल से छुट्टी लेकर घर आ गए हैं। अब ठीक हैं। कुछ दिन बात काम पर लौट आएंगे। इस बार वह अपने भाई का मकान बना रहे हैं। बड़े मन और बहुत प्रेम से। चंपा जी के प्रेम में पगे इस अदुभुत शिल्पकार को महादेव दीर्घायु दें। यही प्रार्थना है।



